शनिवार, 30 जुलाई 2016

[पर्यटन] छत्तीसगढ़ का प्रयाग - राजिम - महानदी पैरी और सोंढुर नदी की संगम स्थल। [Rajim Tourism]

राजिम के प्रसिद्ध राजीवलोचन का मन्दिर चतुर्थाकार में बनाया गया था। उत्तर में तथा दक्षिण में प्रवेश द्वार बने हुए हैं। महामंडप के बीच में गरुड़ हाथ जोड़े खड़े हैं। गर्भगृह के द्वार पर बांये-दांये तथा ऊपर चित्रण है, जिस पर सर्पाकार मानव आकृति अंकित है एवं मिथुन की मूर्तियां हैं। पश्चात् गर्भगृह में राजिवलोचन अर्थात् विष्णु का विग्रह सिंहासन पर स्थित है। यह प्रतिमा काले पत्थर की बनी विष्णु की चतुर्भुजी मूर्ति है। जिसके हाथों में शंक, चक्र, गदा और पदम है जिसकी लोचन के नाम से पूजा होती है। मंदिर के दोनों दिशाओं में परिक्रमा पथ और भण्डार गृह बना हुआ है।

महामण्डप बारह प्रस्तर खम्भों के सहारे बनाया गया है।

उत्तर दिशा में जो द्वार है वहां से बाहर निकलने से साक्षी गोपाल को देख सकते हैं। पश्चात् चारों ओर नृसिंह अवतार, बद्री अवतार, वामनावतार, वराह अवतार के मन्दिर हैं।

दूसरे परिसर में राजराजेश्वर, दान-दानेश्वर और राजिम भक्तिन तेलिन के मंदिर और सती माता का मंदिर है।

इसके बाद नदियों की ओर जाने का रास्ता है। यहां जो द्वार है वह पश्चिम दिशा का मुख्य एवं प्राचीन द्वार है। जिसके ऊपर राजिम का प्राचीन नाम कमलक्षेत्र पदमावती पुरि लिखा है।

नदी के किनारे भूतेश्वर व पंचेश्वर नाथ महादेव के मंदिर हैं और त्रिवेणी के बीच में कुलेश्वर नाथ महादेव का शिवलिंग स्थित है।

राजीवलोचन मंदिर यहां सभी मंदिरों से प्राचीन है। नल वंशी विलासतुंग के राजीवलोचन मंदिर अभिलेख के आधार पर इस मंदिर को 8 वीं शताब्दी का कहा गया है। इस अभिलेख में महाराजा विलासतुंग द्वारा विष्णु के मंदिर के निर्माण करने का वर्णन है।

राजीवलोचन की विग्रह मूर्ति के एक कोने में गजराज को अपनी सूंड में कमल नाल को पकड़े उत्कीर्ण दिखाया गया है। विष्णु की चतुर्भुज मूर्ति में गजराज के द्वारा कमल की भेंट और कहीं नहीं मिलती।

इसके बारे में जो कहानी प्रचलित है वह इस प्रकार है: ग्राह के द्वारा प्रातड़ित गजराज ने अपनी सूंड में कमल के फूल को पकड़कर राजीव लोचन को अर्पित किया था। इस कमल के फूल के माध्यम से गजराज ने अपनी सारी वेदना विष्णु भगवान के सामने निवेदित की थी। विष्णु जी उस समय विश्राम कर रहे थे। महालक्ष्मी उनके पैर दबा रही थीं। गजराज की पीड़ा को देखते ही भगवान ने तुरंत उठकर नंगे पैर दौड़ते हुए राजीव क्षेत्र में पहुंचकर गजराज की रक्षा की थी।

राजिम में कुलेश्वर से लगभग 100 गज की दूरी पर दक्षिण की ओर लोमश ॠषि का आश्रम है। यहां बेल के बहुत सारे पेड़ हैं, इसीलिए यह जगह बेलहारी के नाम से जानी जाती है। महर्षि लोमश ने शिव और विष्णु की एकरुपता स्थापित करते हुए हरिहर की उपासना का महामन्त्र दिया है। उन्होंने कहा है कि बिल्व पत्र में विष्णु की शक्ति को अंकित कर शिव को अर्पित करो। कुलेश्वर महादेव की अर्चना राजिम में आज भी इसी शैली में हुआ करती है। यह है छत्तीसगढ़ की धार्मिक सद्भाव का उदाहरण।

[राज बख्तानी जी द्वारा साझा किया गया ]

गुरुवार, 28 जुलाई 2016

[योजना] स्वच्छ भारत मिशन योजना और इसमें छत्तीसगढ़ के नवरत्न। [Swachh Bharat]

स्वच्छ भारत अभियान -

●पेयजल व स्वच्छता मंत्रालय को स्वच्छता भारत मिशन ग्रामीण का नोडल बनाया है।

● प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की केंद्र सरकार ने 02 अक्टूबर 2014 को महात्मा गांधी जयंती पर देश भर में स्वच्छता अभियान की शुरुआत की।

● शहरी क्षेत्रों में स्वच्छ भारत मिशन के अंतर्गत
व्यक्तिगत शौचालयों के निर्माण, सामुदायिक शौचालय और ठोस अपशिष्ट प्रबंधन पर ध्यान दिया गया है। ग्रामीण क्षेत्रों में ग्राम पंचायत स्तर पर पारस्परिक संवाद, कार्यान्वयन और वितरण तंत्र को मज़बूती के साथ-साथ लोगों में व्यावहारिक बदलाव पर जोर दिया गया है और राज्यों को यह छूट दी गई है कि वे वितरण तंत्र को इस तरह से डिजाईन करें कि उसमें स्थानीय संस्कृतियों, प्रथाओं, उनके भावों एवं मांगों का ध्यान रखा गया हो। शौचालय निर्माण के लिए प्रोत्साहन राशि में 2,000 की वृद्धि करते हुए इसे 10,000 से 12,000 कर दिया गया है। ग्राम पंचायतों में ठोस और तरल अपशिष्ट प्रबंधन के लिए भी राशि आवंटित की गई है।

स्वच्छ भारत मिशन में छत्तीसगढ़ -

●देशभर से स्वच्छता मिशन के लिए चुने गए 75 जिलों में प्रदेश के भी तीन जिलों को केंद्र सरकार ने स्वच्छता अभियान की रैंकिंग में शामिल किया है। रैंकिंग के लिए राजनांदगांव, धमतरी व कोरिया जिले चुने गए हैं।

●छत्तीसगढ़ में राजनांदगांव जिला प्रथम स्थान पर है।

स्वच्छ भारत अभियान में छत्तीसगढ़ के नवरत्न -

1.विवेकानंद आश्रम रायपुर के स्वामी सत्यरूपानंद
2.लोकप्रिय पंडवानी गायिका पद्मश्री तीजन बाई
3.महिला सशक्तिकरण के लिए पधी सम्मानित
सामाजिक कार्यकर्ता फूलबासन यादव
4.पद्मश्री डॉ. एटीके दाबके
5.फिल्म अभिनेता पद्मश्री अनुज शर्मा
6.भारतीय महिला हॉकी टीम की पूर्व कप्तान सबा अंजुम
7.उद्योगपति हरीश केड़िया,
8.भिलाई इस्पात संयंत्र के मुख्य कार्यकारी अधिकारी चन्द्रशेखरन
9.जशपुर जिले के बब्रुवाहन सिंह

मंगलवार, 26 जुलाई 2016

[CG History] छत्तीसगढ़ में मराठा शासन के सम्बन्ध में जानकारी। [CGPSC/CGVYAPAM]

छत्तीसगढ़ और मराठा शासन -

छत्तीसगढ़ के राजनीतिक इतिहास में सन् 1741 ई. परिवर्तन का काल माना जाता है।
भास्कर पंत थे भोंसला शासक के सेनापति। नागपुर के भोंसला। भास्कर पंत ने जब रतनपुर राज्य पर आक्रमण किया, उस समय रघुनाथसिंह रतनपुर के शासक थे। वे 60 वर्ष के थे और इकलौते बेटे की मृत्यु होने के कारण बहुत ही पीड़ित थे। युद्ध करने की मानसिक स्थिति नहीं थी उनकी और उन्होंने आत्मसमपंण कर दिया।
सन् 1741 से सन् 1758 तक मोहन सिंह नाम के एक व्यक्ति को नया शासक नियुक्त किया गया। उसकी जब मृत्यु हो गई, तब भोंसला ने वहाँ अपना शासन स्थापित किया। प्रत्यक्ष शासन जिसे कहेंगे हम और इस प्रकार छत्तीसगढ़ का पहला मराठा शासक बिम्बाजी भोंसला हुआ। ये थी रतनपुर की कहानी। रायपुर शाखा में उस वक्त अमरसिंह, हैदय वंश के शासन कर रहे थे। उनको राजिम रायपुर और पाटन के परगने देकर मराठा उनसे
7000 रु हर वर्ष लेने लगे। अमरसिंह की मृत्यु के बाद उसका बेटा शिवराजसिंह जब राजा बना भोंसले ने उसकी जागीरें छीनकर उसे पाँच गाँव देकर सन् 1757 में रायपुर में अपना प्रत्यक्ष शासन स्थापित किया।
यह नया शासनकाल सन् 1854 तक चलता रहा ।
बिम्बोजी भोंसला के शासनकाल में रायपुर और रतनपुर में संगीत एवं साहित्य का विकास हुआ। भवन-निर्माण हुआ, रायपुर का दूधाधारी मंदिर उनके सहयोग से बना था। रतनपुर की रामटेकरी पर एक राम मन्दिर का निर्माण करवाया। शायद इसीलिए वे अत्यन्त लोकप्रिय हो गये और यहाँ की राजनीति में जो परिवर्तन लाया गया, उसे लोगों ने चुपचाप स्वीकार कर लिया। बिम्बोजी भोंसला ने रतनपुर और रायपुर को प्रशासनिक दृष्टि से एक राज्य बनाकर उसे छत्तीसगढ़ राज्य की संज्ञा प्रदान की।
मराठी संस्कृति के कुछ चीजें छत्तीसगढ़ में भी प्रचलित हो गई - जैसे विजया दशमी पर्व पर "सोने का पत्र" देना ।
छत्तीसगढ़ में मराठी मोड़ी और उर्दू भाषा का प्रयोग भी बिम्बोजी भोंसला ने करवाया। इसी कारण छत्तीसगढ़ में मराठी बोलने वालों की सँख्या अभी भी काफी है। उर्दू भाषा समझने वाले लोग काफी सँख्या में है।
रतनपुर राज्य का प्राचीन वैभव धीरे-धीरे खत्म हो रहा था। बिम्बोजी भोंसला की मृत्यु के बाद जब व्यंकोजी राजा बने, तो उन्होनें नागपुर से ही छत्तीसगढ़ का शासन चलाने का निश्चय किया। इससे पहले छत्तीसगढ़ की राजधानी रतनपुर में रहकर ही शासन किया जा रहा था। धीरे-धीरे नागपुर बन गया छत्तीसगढ़ की राजनैतिक गतिविधियों का केन्द्र। रतनपुर का राजनीतिक परिचय भी धीरे-धीरे समाप्त हो गया।
छत्तीसगढ़ के शासन को इस नये भोंसला राजकुमार ने सूबेदार के माध्यम से चलाने लगे। इसी तरह छत्तीसगढ़ में सूबेदार की परम्परा शुरु हुई - "सूबा-सरकार"। रतनपुर था सूबेदार का मुख्यालय और पूरे क्षेत्र का शासन यहीं से संचालित होता था।
यह प्रणाली सन् 1787 से 1818 ई. तक चलती रही।
एक यूरोपीय यात्री कैप्टन ब्लंट 1795 में रतनपुर और रायपुर में आये थे। उनका कहना था कि रतनपुर एक बिखरता हुआ गाँव प्रतीत हुआ जहाँ लगभग एक हज़ार झोंपड़ियाँ थी - (अरली यूरोपियन ट्रेवला, पृ. 120 )। इससे पता चलता है कि रतनपुर के विकास की ओर कोई भी ध्यान नहीं दे रहा था। रायपुर के बारे में लिखते हैं कैप्टन ब्लंट कि रायपुर एक बड़ा शहर प्रतीत हुआ जहाँ लगभग तीन हज़ार मकान थे। ऐसा लगता है कि रायपुर बहुत पहले से ही एक बड़ा शहर था और इसीलिये शायद अँग्रेजों ने रायपुर को छत्तीसगढ़ की राजधानी बनाया।
छत्तीसगढ़ में "सुबा-सरकार" स्थापित कर मराठा शासक उसके माध्यम से धन वसूल कर नागपुर भेजा करते थे । छत्तीसगढ़ के हिन के लिए शासन की स्थापना नहीं हुई थी।
एक और तरीका था जिसके माध्यम से मराठा शासक किसानों को सरकार पर आश्रित रखते थे - पैसों के स्थान पर कर के रुप में किसानों से अनाज लिया जाता था। अनाज की बिक्री की कोई उचित व्यवस्था नहीं थी। छत्तीसगढ़ का अनाज नागपुर भेजा जाता था। पर यातायात की कठिनाई के लिए दूसरी जगह ले जाने में बहुत ज्यादा खर्च होता था। किसान जब अपने गाँव में ही अनाज बेचते तो उन्हें उचित मूल्य भी नहीं मिलती। सूबा शासन के दौरान छत्तीसगढ़ में लोग कठिनाईयों से परेशान हो गये।
अंकोजी भोंसला के बाद रघुजी द्वितीय अप्पा साहब - ऐसा कहा गया ऐतिहासिकों द्वारा कि - कभी भी जन शिक्षा और सुरक्षा की जरुरतों की ओर ध्यान नहीं दिया। उनकी मूल प्रवृत्ति सैनिक थी। असल में वे हमेशा युद्धों में फँसे रहते थे और इसीलिये जनता के बारे में सोचने के लिए जो वक्त चाहिये, वह उनके पास नहीं था।
छत्तीसगढ़ी के ज्यादातर लोगों की जीविका का आधार कृषि था। प्रमुख उपज - चावल, गेहूँ, चना, कोदो, दाल पर अनाज की बिक्री का कोई सही व्यवस्था न होने के कारण किसानों को बहुत ही कष्ट का सामना करना पड़ता था पर किसानों को अपनी मजबूरी के कारण ही एक जगह से दूसरे जाना पड़ता था। और एक समस्या थी कि यहाँ के कृषक बहुत जल्दी एक स्थान को छोड़कर दूसरे स्थान को चले जाते थे। इसी कारण कृषि योग्य भूमि का समुचित विकास नहीं हो सका। और एक समस्या जो आज भी हर गाँव में किसानो को सामना करना पड़ता है - वह है साहुकारों से ॠण लेने के लिए किसान को अपनी जायदाद गिरवी में रखनी पड़ती थी। इसीलिए बहुत जल्दी उनकी ज़मीन बेदखल हो जाती थी।
भौगोलिक सीमा की दृष्टि से अगर देखा जाये तो हम पाते हैं कि छत्तीसगढ़ चारों ओर पर्वतों से घिरा हुआ है। इसका मध्य भाग जो है वह है मैदानी। इसीलिये यहाँ प्रकृति के निकट रहने वाले की सँख्या को प्राकृतिक सुरक्षा प्राप्त है। छत्तीसगढ़ में नागरिक सभ्यतायें दिखती है और साथ-साथ आख्यक सभ्यतायें देखने का अवसर मिलता है। आरण्यक सभ्यताओं में हमें उदारता सहिष्णुता को देख कर - ताज्जुब होना पड़ता है। ये सभ्यताओं को कोई नष्ट नहीं कर पाये। ये एक खास बात है।

[जय द्वारा साझा किया गया।]

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[CG History] कल्चुरी वंश के सम्बन्ध में जानकारी।

कलचुरि वंश

कलचुरियों की वंशावली किस नरेश से आरम्भ होती है, उसके बारे में अनुमान किया जाता है कि कोकल्लदेव से आरम्भ होती । कोकल्लदेव के वंशज कलचुरी कहलाये। कलचुरि हैदयों की एक शाखा है। हैदयवंश ने रतनपुर और रायपुर में दसवीं शताब्दी से अठारहवीं शताब्दी तक शासन किया ।

कोकल्ल महाप्रतापी राजा थे, पर उनके वंशजों में जाजल्लदेव (प्रथम), रत्नदेव (द्वितीय) और पृथ्वीदेव (द्वितीय) के बारे में कहा जाता है कि वे न सिर्फ महापराक्रमी राजा थे, बल्कि छत्तीसगढ़ के सांस्कृतिक उन्नति के लिए भी चेष्टा की थीं।
जाजल्लदेव (प्रथम) ने अपना प्रभुत्व आज के विदर्भ, बंगाल, उड़ीसा आन्ध्रप्रदेश तक स्थापित कर लिया था। युद्धभूमि में यद्यपि उनका बहुत समय व्यतीत हुआ, परन्तु निर्माण कार्य भी करवाये थे । तालाब खुदवाया, मन्दिरों का निर्माण करवाया। उसके शासनकाल में सोने के सिक्के चलते थे - उसके नाम के सिक्के। ऐसा माना जाता है कि जाजल्लदेव विद्या और कला के प्रेमी थे, वे आध्यात्मिक थे। जाजल्लदेव के गुरु थे गोरखनाथ। गोरखनाथ के शिष्य परम्परा में भर्तृहरि और गोपीचन्द थे - जिनकी कथा आज भी छत्तीसगढ़ में गाई जाती है।
रतनदेव के बारे में ये कहा जाता है कि वे एक नवीन राजधानी की स्थापना की जिसका नाम रतनपुर रखा गया और जो बाद में के नाम से जाना गया। रतनदेव भी बहुत ही हिंसात्मक युद्धों में समय नष्ट की, पर विद्या और कला के प्रेमी थे। इसलिए विद्वानों की कदर थी। रतनदेव ने अनेक मन्दिरों का निर्माण करवाया और तालाब खुदवाया।

पृथ्वीदेव द्वितीय भी बड़े योद्धा थे। कला प्रेमी थे। उसके समय सोने और ताँबे के सिक्के जारी किये गये थे।
कलचुरियों विद्वानों को प्रोत्साहन देकर उनका उत्साह बढ़ाया करते थे। राजशेखर जैसे विख्यात कवि उस समय थे। राजशेखर जी कि काव्य मीमांसा और कर्पूरमंजरी नाटक बहुत प्रसिद्ध हैं। कलचुरियों के समय में विद्वान कवियों को राजाश्रय प्राप्त था। इसीलिये शायद वे दिल खोलकर कुछ नहीं लिख सकते थे। राजा जो चाहते थे, वही लिखा जाता था।
कलचुरि शासको शैव धर्म को मानते थे। उनका कुल शिव-उपासक होने के कारण उनका ताम्रपत्र हमेशा "ओम नम: शिवाय" से आरम्भ होता है। ऐसा कहा जाता है कलचुरियों ने दूसरों के धर्म में कभी बाधा नहीं डाली, कभी हस्तक्षेप नहीं किया। बौद्ध धर्म का प्रसार उनके शासनकाल में हुआ था।
कलचुरियों ने अनेक मंदिरों धर्मशालाओं का निर्माण करवाया।
वैष्णव धर्म का प्रचार, रामानन्द ने भारतवर्ष में किया जिसका प्रसार छत्तीसगढ़ में हुआ। बैरागी दल का गठन रामानन्द ने किया जिसका नारा था -
"जात-पात पूछे नहीं कोई, हरि को भजै सो हरि का होई" -
हैदय-वंश के अन्तिम काल के शासक में योग्यता और इच्छा-शक्ति न होने का कारण हैदय-शासन की दशा धीरे-धीरे बिगड़ती चली गयी और अन्त में सन् 1741 ई. में भोंसला सेनापति भास्कर पंत ने छत्तीसगढ़ पर आक्रमण कर हैदय शासक की शक्ति प्रतिष्ठा को नष्ट कर दिया।

[जय द्वारा साझा किया गया]

[National Trick] भारत के प्रमुख झीलों के नाम राज्य के अनुसार याद रखने के लिए ट्रिक्स।

भारत : प्रमुख  37  झीलें-राज्य ( Trick)

राज्य : जम्मू-कश्मीर
Trick-  डव (साबुन का ब्रांड) ले आना बेशरम।
[ 1]  ड-डल झील
[ 2]  व-वुलर झील
ले- silent
[3]  आ-अनंतनाग झील
[ 4]  ना-नागिन झील
[ 5]  बै-बेरीनाग झील
[ 6]  शर-शेषनाग झील
[ 7]  म-मानस झील
Note :  जिन झीलो के नाम के अंत में नाग आता है वह सभी झीलें जम्मू-कश्मीर की है।

राज्य : उत्तराखण्ड
Trick- नैनी ने सारा माल देखा।
[ 1]  नैनी-नैनीताल झील
[ 2]  ने-नौकुछियाताल झील
[ 3]  सा-सातताल झील
[ 4]  रा-राकसताल झील
[ 5]  माल-मालाताल झील
[ 6]  दे-देवताल झील
[ 7]  खा-खुरपाताल झील
Note :  जिन झीलो के नाम के अंत में ताल आता है वह सभी झीले उत्तराखण्ड की है।

राज्य : राजस्थान
Trick- राज ने फिर सालू को पाँच बजे डराया।
[ 1]  रा-राजसमन्द झील
[ 2]  ज-जयसमंद झील
[ 3]  ने-नक्की झील
[ 4]  फि-फतेहसागर झील, फलोदी झील (जोधपुर)
[ 5]  र-रेवासा झील (सीकर)
[ 6]  सा-सांभर झील (जयपुर)
[ 7]  लू-लूनकरनसर झील (बीकानेर)
[ 8]  को-कोछोर झील (सीकर), कावोद झील और कछोर झील (जैसलमेर), कुचामन झील (नागौर)
[ 9]  पाँच-पंचपदरा झील (बाड़मेर), पोकरण झील (जैसलमेर)
[ 10]  बजे-बाप झील (जोधपुर)
[ 11]  डराया-डिडवाना झील (नागौर)

राज्य : आन्ध्र प्रदेश
Trick- आधा हक़
[ 1]  ह-हुसैन सागर झील
[ 2]  क-कोलेरु झील
राज्य : उड़ीसा
चिल्का झील
राज्य : महाराष्ट्र
लोनार झील
राज्य : तमिलनाडु
पुलीकट झील
राज्य : केरल
बेम्बानड झील
राज्य : मणिपुर
लोकटल झील

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रविवार, 24 जुलाई 2016

[पर्यटन]छत्तीसगढ़ का कांशी खरौद में लाख क्षिद्रों वाले लक्ष्मणेश्वर महादेव ।

●इतिहासकारों के अनुसार इस मंदिर का निर्माण छठी शताब्दी में हुआ था।

●शिवलिंग में एक लाख छिद्र होने के कारण इसे लक्षलिंग भी कहते हैं।

●छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर से 120 किलोमीटर दूर काशी के नाम से प्रसिद्ध खरौद नगर में स्थित लक्ष्मणेश्वर महादेव मंदिर अपने आप में अनूठा है। 

●रामायणकालीन इस मंदिर के गर्भगृह में एक लक्षलिंग ( शिवलिंग) है जिसमें एक लाख छिद्र हैं। किवदंती है कि इनमें से एक छिद्र पाताल का रास्ता है।

● मंदिर के दक्षिण भाग के शिलालेख के में आठवी शताब्दी के इन्द्रबल तथा ईशानदेव नामक शासकों का उल्लेख हुआ है।

●मंदिर के वाम भाग का शिलालेख संस्कृत भाषा में है। इसमें ४४ श्लोक है। चन्द्रवंशी हैहयवंश में रत्नपुर के राजाओं का जन्म हुआ था। इनके द्वारा अनेक मंदिर, मठ और तालाब आदि निर्मित कराने का उल्लेख इस शिलालेख में है। तदनुसार रत्नदेव तृतीय की राल्हा और पद्मा नाम की दो रानियाँ थीं। राल्हा से सम्प्रद और जीजाक नामक पुत्र हुए। पद्मा से सिंहतुल्य पराक्रमी पुत्र खड्गदेव हुए जो रत्नपुर के राजा भी हुए जिसने लक्ष्मणेश्वर मंदिर का जीर्णोद्धार कराया। 

● इतिहासविद डॉ. बसुबंधु दीवान के अनुसार शिवलिंग में एक लाख छिद्र होने के कारण इसे लक्षलिंग भी कहते हैं और मंदिर लखेश्वर महादेव के नाम से भी जाना जाता है। लिंग का एक छिद्र ऐसा है जिसमें कितना भी पानी डाला जाए वह पूरा सोख लेता है। मान्यता है कि वह छिद्र पाताल गामी है, उसमें जितना भी पानी डालो वह पाताल में चला जाता है। वहीं लिंग में एक अन्य छिद्र के बारे में मान्यता है कि वह अक्षय छिद्र है। उसमें हमेशा जल भरा होता है। जो कभी सूखता ही नहीं है।


●रायपुर के आचार्य अजय शर्मा के अनुसार लक्षलिंग से जुड़ी पौराणिक कथा लक्षलिंग के पीछे रामायण की एक रोचक कहानी है। रावण एक ब्राह्मण थे। अत: उनका वध करने के बाद भगवान राम को ब्रह्म हत्या का पाप लगा। इस पाप से मुक्ति पाने के लिए राम और लक्ष्मण ने शिव के जलाभिषेक का प्रण लिया। इसके लिए लक्ष्मण सभी प्रमुख तीर्थ स्थलों से जल एकत्रित करने निकले।
इस दौरान गुप्त तीर्थ शिवरीनारायण से जल लेकर अयोध्या के लिए निकलते समय वे रोगग्रस्त हो गए। रोग से छुटकारा पाने के लिए लक्ष्मण ने शिव की आराधना की, इससे प्रसन्न होकर शिव ने लक्ष्मण को दर्शन दिया और लक्षलिंग रूप में विराजमान हो गए। लक्ष्मण ने लक्षलिंग की पूजा की और रोग मुक्त हो गए। जिसके बाद यह मंदिर लक्ष्मणेश्वर महादेव के नाम से प्रसिद्ध हुआ। तब से इसे लोग लक्ष्मणेश्वर महादेव के नाम से ही जानते हैं।

[अभिनव मिश्रा द्वारा साझा किया गया।]

[Chhattisgarh GK] छत्तीसगढ़ की कुछ प्रमुख साहित्यिक रचनाएँ और उनके रचनाकार।

छत्तीसगढ़ साहित्य संदर्भ

📒खूब तमाशा काव्यग्रन्थ-गोपाल कवि

📒प्रथम छत्तीसगरि उपन्यास प्रकाशित-हीरू के कहिनी
                 www.CGnaukri.in
📒बहुचर्चित उपन्यास 'नोकर की कमीज' के उपन्यासकार-विनोद कुमार शुक्ल

📒बहुचर्चित गीत 'सुरता के चन्दन' के रचयिता-हरि ठाकुर
                www.CGnaukri.in
📒कालिदास कृत मेघदूत का छत्तीसगढ़ी में अनुवाद-पंडित मुकुटधर पाण्डेय

📒कर्मवीर पत्रिका का प्रकाशन सन् 1920 में किया-माधवराव सप्रे जी ने

📒छायावाद के प्रथम कविता लिखने वाले पहले कवि-पंडित मुकुटधर पाण्डेय

📒विश्व प्रसिद्द काव्यकृति 'ब्रह्मरक्षास' रचना है-गजानन माधव मुक्तिबोध

📒तारीख-ए-हैहयवंशी -बाबू रेवाराम

📒भोसला वंश प्रशस्ति-लक्ष्मण कवि

📒फुटहा करम-केयूर भूषण

📒छत्तीसगढ़ी रामायण/दानलीला-पं.सुन्दरलाल शर्मा

📒हालैंड की स्वतन्त्रता का इतिहास-बैरिस्टर छेदीलाल

📒पर्रा भर लाई-श्याम चतुर्वेदी

📒सूरज नई मरै-नारायण लाल परमार

📒छग के इस कवि ने अंतर्मन के कवि की उपाधि प्राप्त की-गजानन माधव मुक्तिबोध

📒छग की प्रथम कहानी-ढोला के कहिनी

📒छग का प्रथम प्रबंधकाव्य-छत्तीसगढ़ी
दानलीला

📒छग का पाणिनि-हीरालाल काव्योपाध्याय

📒गांधी मीमांसा -रामदयाल तिवारी

📒छग में साहित्य समालोचना प्रारम्भ करने वाले विभूति-माधवराव सप्रे

📒छग के जनकवि-कोदूराम दलित

📒छग के सशक्त कवि-धरमदास

📒छत्तीसगढ़ी भाषा के प्रथम उपन्यासकार-बंशीधर पाण्डेय

📒छंद रत्नाकर-पं जगन्नाथ भानु

📒स्वदेशी आंदोलन और बायकट-पं माधवराव सप्रे

📒मोर संग चलव रे(गीत)-लक्ष्मण मस्तुरिया

📒कहा बिलागे मोर धान के कटोरा-केयूर
भूषण
                www.CGnaukri.in
📒लवंगलता-प्यारे लाल गुप्त

📒छत्तीसगढ़ परिचय-बलदेव प्रसाद मिश्र

[भूमि विश्वास द्वारा साझा किया गया]

नदियों के क्रम में आज जानिए सोन नदी के बारे में। [Son River Chhattisgarh]

सोन नदी:-
सोन राज्य की महत्वपूर्ण नदी है। सोन के उद्गम को लेकर अनेक तर्क तथ्य मिथक और कथायें हैं । मिथकीय तौर पर इसका उद्गम अमरकंटक में नर्मदाकुंड के विपरीत स्थित सोनमुड़ा है, सोनमुड़ा से निकला जल माही नाला से मिलता है, जो कि आरपा और शिवनाथ की सहायक नदी है ।

वैसे वैज्ञानिक रूप से प्रमाणित उद्गम स्थल प्रेंड्रा के सोन बचरवार के पास है ।
यह नदी बहुत पवित्र मानी जाती है । यह विश्वास किया जाता है कि इसके किनारों पर स्नान करने से मुक्ति मिलती है और यहां तक कि ब्रम्ह हत्या करने वाले व्यक्ति को भी स्वर्ग मिलता है । संस्कृत साहित्य में इसे हिरण्य वाह या हिरण्य वाहु भी कहा गया है एरियन के सोनस एरनोबोअस को भी सोन माना जाता है । रामचरितमानस, भागवत पुराण तथा महाभारत में अनेक प्रसंगों में इस नदी का उलेख मिलता है।

सोन नदी के संबंध में अनेक कथाएं प्रचलित हैं । एक कथा में सोन और नर्मदा को अमरकंटक पर्वत श्रेणी के दोनों ओर गिरे ब्रम्हा के दो आंसुओं से उत्पन्न बताया गया है । इस कथा में कहा गा है कि सोनभद्र (इजसे नर नदी कहा जाता है) कुंवारी नर्मदा के आनिंद्य सौंदर्य का समाचार पाकर उसे प्रणय याचना करने के लिए आया । सोनभद्र के आगमन का समाचार पाकर नर्मदा ने नदी का रूप धारण कर लिया और त्रस्त होकर अपने घर अमरकंटक से तेजी से बह निकली । यहां यह तथ्य भी रूचिकर है कि जहाँ भारत की लगभग सभी नदियों के नाम (ब्रम्हपुत्र को छोड़कर) ी वाची है, वहां सोनभद्र नाम पुरूष वाची इसी बीच है एक जनश्रुति अन्य में कहा गया है कि नर्मदा तथा सोन एक दूसरे से प्रेम करते थे किन्तु इसी बीच सोन ने गंगा की ओर बहना शुरू कर दिया इसे गंगा के प्रति सोन की आशक्ति का संकेत मानकर नर्मदा ने निराशा और क्रोध से भरकर पश्चिम को ओर बहना शुरू कर दिया और सोनभद्र को उत्तरकी ओर बहकर गंगा से मिलने के लिए छोड़ दिया ।
इस नदी को यूनानी भूगोल के वेत्ता के एरियन मेगास्थनीज द्वारा वर्णित एरानोबोअस (हिरण्य वाह) और टालिमी की सोआ (सोन) भी माना गया है। सोन की हिरण्य वाह या सोने की भुजा वाला भी गया है, जो शिव की उपाधि है । सि नदी के नाम की व्युत्पत्ति संबंधी विभिन्न व्याख्याएं, जो कि अधिकांशत: अर्वाचीन है,सोन महात्म्य तथा वृहत ब्रम्ह पुराण में दी गई है ।
सोन नदी अपने उद्गम स्थल से निकलकर लगभग उत्तर की ओर बहती है और उसके बाद मरवाही पठार, जो अपेक्षाकृत समतल तथा अधिक आबाद क्षेत्र है, में प्रवेश करने से पूर्व उत्तर-पश्चिम की ओर मुड़ जाती है । यह नदी इस जिले में गभग 48 किलोमीटर तक बहती है और यहां इसकी श्रेणी द्रोणी संकरी है जिसकी इसकी महत्वपूर्ण समायक नदियां खुज्जी, माला गंगनई, नाला तथा गुजर नाला जिले की उत्तर पश्चिमी सीमा के किनारे -किनारे बहती है और वह सोन में उस स्थान पर मिलती है, जहां से वह शहडोल जिले में प्रवेश करती है । आगे चलकर इस नदी में बरतू के समीप जाहिला और सरसी के समीप महानदी आ कगारों से आगे बढ़ती है । छत्तीसगढ़ छोडऩे और उत्तर प्रदेश में प्रवेश करने के पूर्व दम्भा के समीप बनास तथा के बरडी के समीप गोपद इसमें आकर मिलती है । राज्य में इसका अधिकांश प्रवाह मार्ग समुद्र तल से 308 मीटर के ऊपर है । गोपद के संगम के बाद इसका पाट चौड़ा हो जाता है और सीधी होकर लगभग 242 मीटर बहने लगती है । गंगा के निचले मैदान में प्रवेश करने से पूर्व इसके दाहिने किनारे पर रिहन्द, कन्हार, तथा उत्तर कोईल इससे मिल जाती है। यह रामनगर के पास गंगा से जाकर मिल जाती है।

सोन नदी का तल इसकी पूरी लंबाई में लगभग विंध्य बलुआ पत्थर का है। अनेक स्थानों पर विशेषकर निचली घाटी में, वर्ष के अधिकांश समय में वह बालू से भरी रहती है, और जल धारा बहुत मामली होती है, जिसे लगभग सभी स्थानों पर चलकर पार किया जा सकता है । एक पुराने अनुमान के अनुसार इस समय पानी प्रति सेकेन्ड 620 क्यूबिक फूट निम्न स्तर तक हो जाता है । यह प्रवाह एक सा रहता है किन्तु वर्षा काल में कुछ घंटों की वर्षा होने पर यह नदी गरजते हुए बहने लगती है और यदा कदा बही हुई बालू के ढेर छोड़ जाती है । यह खतरनाक बलुआ दल-दल चोर- बारू कहलाता ै । जब विन्ध्य पठार पर भीषण वर्षा होती है, तो नदी में बाढ़ आ जाती है । इसका वेग प्रति सेकेण्ड 830000 घन फुट होता है, जो इस प्रणाली को निकास क्षमता से बहुत अधिक होता है ये भारी बाढ़ अल्प अवधि की होती है और कदाचित ही चार दिन से अधिक की होती है, किन्तु कभी-कभी निचले मैदानों के लिए विनाशकारी होती है । तथापि नदी बाढ़ ग्रस्त क्षेत्रों में अपने पीछे उर्वर गाद जमा कर जाती है। निचले मैदानों में इसका पाटा अत्यधिक चौड़ा है, और कुछ स्थानों तक फैला हुआ है।

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