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[CG History] छत्तीसगढ़ का ऐतिहासिक सन्दर्भ एक नज़र।

मंगलवार, 12 जुलाई 2016

/ by StudyCircle247

मध्य प्रदेश से बनाया गया यह राज्य भारतीय संघ के 26 वें राज्य के रूप में 1 नवंबर, 2000 को पूर्ण अस्तित्व में आया।
प्राचीन काल में इस क्षेत्र को 'दक्षिण कोशल' के नाम से जाना जाता था।
इस क्षेत्र का उल्लेख रामायण और महाभारत में भी मिलता है।
छठी और बारहवीं शताब्दियों के बीच सरभपूरिया, पांडुवंशी, सोमवंशी, कलचुरी और नागवंशी शासकों ने इस क्षेत्र पर शासन किया।
कलचुरी और नागावंशी शासकों ने इस क्षेत्र पर शासन किया कलचुरियों ने छत्तीसगढ़ पर सन् 980 से लेकर 1791 तक राज किया सन् 1854 में अंग्रेज़ों के आक्रमण के बाद महत्त्व बढ़ गया सन् 1904 में संबलपुर उड़ीसा में चला गया और 'सरगुजा' रियासत बंगाल से छत्तीसगढ़ के पास आ गई।
छत्तीसगढ़ पूर्व में दक्षिणी झारखण्ड और उड़ीसा से, पश्चिम में मध्य प्रदेश और महाराष्ट्र से, उत्तर में उत्तर प्रदेश और पश्चिमी झारखण्ड और दक्षिण में आंध्र प्रदेश से घिरा है।
छत्तीसगढ़ क्षेत्रफल के हिसाब से देश का नौवां बड़ा राज्य है और जनसंख्या की दृष्टि से इसका 17वां स्थान है।

छत्तीसगढ़ का इतिहास 10 हजार साल से भी ज्यादा पुराना है. यहां की पत्थरों और चट्टानों में पुरातत्वविदों ने मानव सभ्यता के विकास के चिन्ह पाए हैं. माना जाता है कि बस्तर के दण्डकारण्य क्षेत्र में भगवान राम ने अपने वनवास के पूरे 14 साल अथवा उनमें से कुछ वर्ष बिताए हैं. छत्तीसगढ़ का स्पष्ट इतिहास 4थी शताब्दी से मिलता है, जब इसे दक्षिण कोसल के नाम से जाना जाता था. अनेक विदेशी यात्रियों और इतिहासकारों ने कुछ शताब्दी पहले तक के लेखन में इस क्षेत्र का नाम दक्षिण कोसल ही रखा.

प्रख्यात इतिहासकार सी. डब्ल्यू विल्स राइट्स के अनुसार दसवीं शताब्दी में जबलपुर के निकट त्रिपुरी में शक्तिशाली राजपूत शासकों ने राज्य किया. उनके वंशजों में से एक कलिंगराजा ने तुमान में ईस्वी सन् 1000 के आसपास तुमान के पास एक नई जमींदारी की स्थापना की. यह जगह छत्तीसगढ़ के उत्तरपूर्व में अब कोरबा जिले के हिस्से में कटघोरा के पास है. उनके पोते रत्नराजा ने रतनपुर को अपनी राजधानी बनाई. आज भी यह महामाया शक्तिपीठ के रूप में छत्तीसगढ़ का प्रमुख धार्मिक स्थल है तथा यहां पर राजमहल जीर्ण-शीर्ण अवस्था में मौजूद है. 14 वीं शताब्दी तक रतनपुर से पूरे छत्तीसगढ़ में शासन किया जाता रहा, बाद में रायपुर में भी उप-राजधानी बनाई गई. 16वीं शताब्दी के अंत तक जब देश में मुगल शासकों का प्रवेश हुआ बस्तर में चालुक्य राजाओं ने शासन किया. मराठा शासकों ने छत्तीसगढ़ में 1741 में आक्रमण किया और उन्होंने हैहयवंशी शासकों की सत्ता समाप्त की. छत्तीसगढ़ नामकरण मराठा शासकों के कार्यकाल में ही किया गया. नागपुर में जब ब्रिटिश शासकों ने प्रांत की स्थापना की, वहां से छत्तीसगढ़ के लिए कानून लागू किये जाते रहे तथा राजस्व वसूली के लिए अधिकारियों की नियुक्ति की गई. सन् 1818 में छत्तीसगढ़ में एक डिप्टी कमिश्नर की नियुक्ति कर दी गई. बस्तर के आदिवासियों और हल्बा जनजातियों ने ब्रिटिश शासन के खिलाफ लगातार लड़ाई लड़ी. ब्रिटिश तथा मराठा शासकों के खिलाफ बस्तर के लोगों की लड़ाई के प्रारंभिक प्रमाण सन् 1774 के आसपास मिलते हैं. यह लड़ाई 1779 तक चलती रही. अंग्रेजों के खिलाफ 1857 में हुए प्रथम स्वतंत्रता संग्राम का भी छत्तीसगढ़ गवाह रहा है. इसकी अगुवाई वीरनारायण सिंह ने की, जो सोनाखान के लोकप्रिय जमींदार थे. अंग्रेजों ने उन्हें 1856 में गिरफ्तार कर लिया. वीर नारायण सिंह पर आरोप था कि उसने एक व्यापारी के गोदाम से अनाज लूट लिया और उसे गरीबों में बांट दिया. सन् 1857 में अंग्रेजी सेना में मौजूद कुछ सिपाहियों की मदद से ही वीर नारायण अंग्रेजों के चंगुल से भाग जाने में सफल हो गया. उन्होंने करीब 500 लोगों की सैन्य शक्ति तैयार कर अंग्रेजों को ललकारा. ब्रिटिश सेनापति स्मिथ की अगुवाई में वीरनारायण का सामना अंग्रेजों ने किया. लम्बी लड़ाई के बाद वीरनारायण को गिरफ्तार करने में अंग्रेजी सैनिकों को सफलता मिल गई. बाद में उन्हें फांसी पर चढ़ा दिया गया.इस तरह से छत्तीसगढ़ के इतिहास में वीरनारायण सिंह का नाम प्रथम स्वतंत्रता संग्राम के प्रथम सेनानी के रूप में दर्ज है. छत्तीसगढ़ की भौगोलिक, सांस्कृतिक विभिन्नताओं की वजह से इसे हमेशा से एक अलग राज्य का दर्जा देने की मांग की जाती रही.

रामायण कालीन

ऐसे अनेकों तथ्य हैं जो इंगित करते हैं कि ऐतिहासिक दृष्टि से छत्तीसगढ़ प्रदेश की प्राचीनता रामायण युग को स्पर्श करती है। उस काल में दण्डकारण्य नाम से प्रसिद्ध यह वनाच्छादित प्रान्त आर्य-संस्कृति का प्रचार केन्द्र था। यहाँ के एकान्त वनों में ऋषि-मुनि आश्रम बना कर रहते और तपस्या करते थे। इनमें वाल्मीकि, अत्रि, अगस्त्य, सुतीक्ष्ण प्रमुख थे इसीलिये दण्डकारण्य में प्रवेश करते ही राम इन सबके आश्रमों में गये।

प्रतीत होता है कि छोटा नागपुर से लेकर बस्तर तथा कटक से ले कर सतारा तक के बिखरे हुये राजवंशों को संगठित कर राम ने वानर सेना बनाई हो। आर.पी. व्हान्स एग्न्यू लिखते हैं, "सामान्य रूप से इस विश्वास की परम्परा चली आ रही है कि रतनपुर के राजा इतने प्राचीनतम काल से शासन करते चले आ रहे हैं कि उनका सम्बन्ध हिन्दू 'माइथॉलाजी' (पौराणिक कथाओं) में वर्णित पशु कथाओं से है। (चारों महान राजवंश) सतारा के नरपति, कटक के गजपति, बस्तर के रथपति और रतनपुर के अश्वपति हैं" । अश्व और हैहय पर्यायवाची हैं। श्री एग्न्यू का मत है कि कालान्तर में 'अश्वपति' ही हैहय वंशी हो गये। इससे स्पष्ट है कि इन चारों राजवंशो का सम्बन्ध अत्यन्त प्राचीन है तथा उनके वंशों का नामकरण चतुरंगिनी सेना के अंगों के आधार पर किया गया है।

बस्तर के शासकों का 'रथपति' होने के प्रमाण स्वरूप आज भी दशहरे में रथ निकाला जाता है तथा दन्तेश्वरी माता की पूजा की जाती है। यह राम की उस परम्परा का संरक्षण है जब कि दशहरा के दिन राम ने शक्ति की पूजा कर लंका की ओर प्रस्थान किया था। यद्यपि लोग दशहरा को रावण-वध की स्मृति के रूप में मनाते हैं किन्तु उस दिन रावण का वध नहीं हुआ था वरन उस दिन राम ने लंका के लिये प्रस्थान किया था। (दशहरा को रावण-वध का दिन कहना ठीक वैसा ही है जैसे कि संत तुलसीदास के 'रामचरितमानस' को 'रामायण' कहना।)

राजाओं की उपाधियों से यह स्पष्ट होता है राम ने छत्तीसगढ़ प्रदेश के तत्कालीन वन्य राजाओं को संगठित किया और चतुरंगिनी सेना का निर्माण कर उन्हें नरपति, गजपति, रथपति और अश्वपति उपाधियाँ प्रदान की। इस प्रकार रामायण काल से ही छत्तीसगढ़ प्रदेश राम का लीला स्थल तथा दक्षिण भारत में आर्य संस्कृति का केन्द्र बना।

ऐतिहासिक संदर्भ

ह्मवेनसांग, प्रसिद्ध चीनी यात्री, सन 639 ई० में भारतवर्ष जब आये तो वे छत्तीसगढ़ में भी पधारे थे। उनकी यात्रा विवरण में लिखा है कि दक्षिण-कौसल की राजधानी सिरपुर थी। ह्मवेनसांग सिरपुर में रहे थे कुछ दिन। वे अपने ग्रन्थ में लिखते हैं कि गौतम बुद्ध सिरपुर में आकर तीन महीने रहे थे। इसके बारे में बहुत ही रोचक एक कहानी प्रचलित है - उस समय सिरपुर में विजयस नाम के वीर राजा राज्य करते थे। एक बार की बात है, श्रीवस्ती के राजा प्रसेनजित ने छत्तीसगढ़ पर आक्रमण कर दिया, मगर युद्ध में प्रसेनजित ही हारने लगे थे। जैसे ही वे हारने लगे, उन्होने गौतम बुद्ध के पास पँहुचकर उनसे विनती की कि वे दोनों राजाओं में संधि करवा दें। विजयस के पास जब संधि की वार्ता पहुँची तो उन्होंने कहा कि यह तब हो सकता है जब गौतम बुद्ध सिरपुर आयें और यहाँ आकर कुछ महीने रहें। गौतम बुद्ध इसी कारण सिरपुर में तीन महीने तक रहे थे।

बोधिसत्व नागार्जुन, बौद्ध धर्म की महायान शाखा के संस्थापक, का आश्रम सिरपुर (श्रीपुर) में ही था, नागार्जुन उस समय थे जब छत्तीसगढ़ पर सातवाहन वंश की एक शाखा का शासन था। नागार्जुन और सातवाहन राजा में गहरी दोस्ती थी। ये पहली शताब्दी की बात है। पहली शताब्दी में नागार्जुन का जन्म सुन्दराभूति नदी के पास स्थित महाबालुका ग्राम में हुआ था। हरि ठाकुर अपनी पुस्तक ""छत्तीसगढ़ गाथा'' (रुपान्तर लेखमाला-१) में कहते हैं कि सुन्दराभूति नदी को आजकल सोन्टुर नदी कहते हैं और महाबालुका ग्राम आज बारुका कहलाता है। नागार्जुन ने अपनी ज़िन्दगी में तीस ग्रन्थ लिखे। उन्होने एक आयुर्वेदिक ग्रंथ की रचना की थी जिसका नाम है, ""रस-रत्नाकर''। नागार्जुन एक महान रसायन शास्री भी थे, उनका आश्रम एक प्रसिद्ध केन्द्र था जहाँ देश-विदेश से छात्र आते थे पढ़ने के लिये। ऐसा कहते हैे कि बोधिसत्व नागार्जुन ने श्रीपर्वत पर 12 वर्षों तक तपस्या की थी। ये पर्वत स्थित हैं कोरापुट जिले में जो बस्तर के नज़दीक है। नागार्जुन बाद में नालंदा विश्वविद्यालय के कुलगुरु निर्वाचित हुए थे। श्रीपुर में और एक विद्वान रहते थे - आचार्य बुद्ध घोष। वे बौद्ध धर्म के महान विद्वान थे। श्रीपुर में एक शिलालेख मिला है जिसमें उनका नाम है। आचार्य बुद्ध घोष बाद में श्रीलंका चले गये थे। वे बहुत अच्छे कवि भी थे। उन्होंने कई ग्रन्थ लिखे।

मौर्यकाल

ह्मवेनसांग, प्रसिद्ध चीनी यात्री का यात्रा विवरण पढ़ने पर हम देखते हैं कि अशोक, मौर्य सम्राट, ने यहाँ बौद्ध स्तूप का निर्माण करवाया था। सरगुजा जिले में उस काल के दो अभिलेख मिले हैं जिससे यह पता चला है कि दक्षिण-कौसल (छत्तीसगढ़) में मौर्य शासन था, और शासन-काल 400 से 200 ईसा पूर्व के बीच था। ऐसा कहते हैं कि कलिंग राज्य जिसे अशोक ने जीता था और जहाँ युद्ध-क्षेत्र में अशोक में परिवर्तन आया था, वहां का कुछ भाग छत्तीसगढ़ में पड़ता था। छत्तीसगढ़ में मौर्यकालीन अभिलेख मिले हैं। ये अभिलेख ब्राह्मी लिपि में उत्कीर्ण हैं।
मौर्य के बाद भारत में चार प्रमुख राजवंशों का आविर्भाव हुआ -

मगध राज्य में शुंगों का उदय

कलिंग राज्य में चेदि वंश

दक्षिण पथ में सातवाहन

पश्चिम भाग में दूसरे देश का प्रभाव

सातवाहन काल - यह काल 200 ई० पूर्व से 60 ई० पूर्व के मध्य का है। सातवाहन वंश के राजा खुद को दक्षिण पथ का स्वामी कहते थे। वे साम्राज्यवादी थे। सातवाहन वंश के शतकर्णि (प्रथम) अपने राज्य का विस्तार करते हुए जबलपुर पहुँच गये थे। जबलपुर तक उनका राज्य था। कुछ साल पहले बिलासपुर जिले में कुछ सिक्के पाए गये हैं जो सातवाहन काल के थे। बिलासपुर जिलो में पाषाण प्रतिमाएं मिली हैं जो सातवाहन काल की हैं। बिलासपुर जिले में सक्ती के पास ॠषभतीर्थ में कुछ शिलालेख पाए गये हैं जिसमें सातवाहन काल के राजा कुमारवर दत्त का उल्लेख है।

ह्मवेनसांग, प्रसिद्ध चीनी यात्री अपने यात्रा विवरण में लिखते हैं कि नागार्जुन (बोधिसत्व) वहां रहते थे।

वकाटक वंश - छत्तीसगढ़ के दुर्ग जिले में एक ताम्रपत्र मिला था कुछ साल पहले। वह ताम्रपत्र वकाटक वंश का है। वकाटक वंश बहुत कम समय के लिये छत्तीसगढ़ में था। प्रवरसेन (प्रथम) जो वकाटक वंश के राजा थे, वे दक्षिण कौसल पर अपना अधिकार स्थापित कर लिया था। पर इनकी मृत्यु के बाद वंश का आधिपत्य खत्म हो गया और यहां गुप्तों का अधिकार स्थापित हो गया।

पाण्डुवंश

पाण्डुवंशियों ने शरभपुरीय राजवंश को पराजित करने के बाद श्रीपुर को अपनी राजधानी बनाया। ईस्वी सन छठी सदी में दक्षिण कौसल के बहुत बड़े क्षेत्र में इन पाण्डुवंशियों का शामन था।

पाण्डववंशी राजा सोमवंशी थे और वे वैष्णव धर्म को मानते थे।

पाण्डुवंश के प्रथम राजा का नाम था उदयन। इस वंश में एक राजा का नाम था इन्द्रबल।

मांदक में जो अभिलेख प्राप्त हुआ है, उसमें इन्द्रबल के चार पुत्रों का उल्लेख किया गया है।

इन्द्रबल का एक बेटा था नन्न। राजा नन्न बहुत ही वीर व पराक्रमी था। राजा नन्न ने अपने राज्य का खूब विस्तार किया था।

राजा नन्न का छोटा भाई था ईशान-देव। उनके शासनकाल में पाण्डुवंशियों का राज्य दक्षिण कौसल के बहुत ही बड़े क्षेत्र पर फैल चुका था। खरोद जो बिलासपुर जिले में स्थित है, वहां एक शिलालेख मिला है जिसमें ईशान-देव का उल्लेख किया गया है।

राजा नन्न का पुत्र महाशिव तीवरदेव ने वीर होने के कारण इस वंश की स्थिति को और भी मजबूत किया था। महाशिव तीवरदेव को कौसलाधिपति की उपाधि मिली थी क्योंकि उन्होंने कौसल, उत्कल व दूसरे और भी कई मण्डलों पर अपना अधिकार स्थापित किया था।

राजिम और बलौदा में कुछ ताम्रपत्र मिले हैं जिससे पता चलता है कि महाशिव तीवरदेव कितने पराक्रमी थे।

महाशिव तीवरदेव का बेटा महान्न उनके बाद राजा हुआ। वे बहुत ही कम समय के लिये राजा बने थे। उनकी कोई सन्तान नहीं थी। इसीलिये उनके बाद उनके चाचा चन्द्रगुप्त कौसल के नरेश बने।

बस्तर के नल और नाग वंश

कुछ साल पहले अड़ेगा, जो जिला बस्तर में स्थित है, वहाँ से कुछ स्वर्ण-मुद्राएं मिली थीं। स्वर्ण-मुद्राओं से पता चलता है कि वराह राज, जो नलवंशी राजा थे, उनका शासन बस्तर के कोटापुर क्षेत्र में था। वराहराज का शासन काल ई. स. 440 में था। उसके बाद नल राजाओं जैसे भवदन्त वर्मा, अर्थपति, भट्टाटक का सम्बन्ध बस्तर के कोटापुर से रहा। ये प्राप्त लेखों से पता चलता है।

कुछ विद्वानों का कहना है कि व्याध्रराज नल-वंशी राजा थे। ऐसा कहते हैं कि व्याध्रराज के राज्य का नाम महाकान्तर था। और वह महाकान्तर आज के बस्तर का वन प्रदेश ही है। व्याध्रराज के शासन की अवधि थी सन् 350 ई.।

नल वंशी राजाओं में भवदन्त वर्मा को प्रतापी राजा माना जाता है। उनके शासन काल की अवधि सन् 440 से 465 ई. मानी जाती है।

अर्थपति भट्टारक, भवदन्त वर्मा के पुत्र ने महाराज की पदवी धारण कर सन् 465 से  475 ई. तक शासन किया।

अर्थपति के बाद राजा बने उसके भाई स्कन्द वर्मा जिन्होंने शत्रुओं से अपने राज्य को दुबारा हासिल किया था। ऐसा कहते हैं कि स्कन्द वर्मा ने बस्तर से दक्षिण - कौसल तक के क्षेत्र पर शासन किया था।

स्कन्द वर्मा के बाद राजा बने थे नन्दन राज। आज तक यह स्पष्ट नहीं हो सका कि वे किसके पुत्र थे।

नलवंश में एक और राजा के बारे में पता चलता है - उनका नाम था पृथ्वी राज। वे बहुत ही ज्ञानी थे। चिकित्सा शास्र में उनकी दखलंदाज़ी थी

उनके बाद राजा बने विरुपराज। उनके बारे में यह कहा जाता है कि वे बहुत ही सत्यवादी थे। उनकी तुलना राजा हरिश्चन्द्र के साथ ही जाती है।

कवर्धा के फणि नागवंश

कवर्धा रियासत जो बिलासपुर जिले के पास स्थित है, वहाँ चौरा नाम का एक मंदिर है जिसे लोग मंडवा-महल के नाम से जानते हैं। उस मंदिर में एक शिलालेख है जो सन् 1349 ई. मेंे लिखा गया था उस शिलालेख में नाग वंश के राजाओं की वंशावली दी गयी है। नाग वंश के राजा रामचन्द्र ने यह लेख खुदवाया था। इस वंश के प्रथम राजा अहिराज कहे जाते हैं। भोरमदेव के क्षेत्र पर इस नागवंश का राजत्व 14 वीं सदी तक कायम रहा।

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