सोमवार, 22 अगस्त 2016

[लोक पर्व] कमरछठ - खमरछठ - हलछठ या हलषष्ठी के नाम से जाना जाने वाला लोकपर्व पर संक्षिप्त जानकारी।

कमरछठ (हलषष्ठी) यह पर्व माताओं का संतान के लिए किया जानेवाला, छत्तीसगढ़ राज्य की अनूठी संस्कृति का एक ऐसा पर्व है जिसे हर वर्ग हर जाति में बहुत ही सदभावपूर्वक मनाया जाता है।
हलषष्ठी को हलछठ, कमरछठ या खमरछठ भी कहा जाता है। यह पर्व भाद्रपद मास के कृष्ण पक्ष की षष्ठी तिथि को मनाया जाता है। संतान प्राप्ति व उनके दीर्घायू सुखमय जीवन की कामना रखकर माताएँ इस व्रत को रखतीहै।इस दिन माताएं सुबह से ही महुआ पेड़ की डाली का दातून कर, स्नान करव्रत धारण करती हैं। भैस के दुध की चाय पीती हैं तथा दोपहर के बाद घर के आंगन में, मंदिर-देवालय या गांव के चौपाल आदि में बनावटी तालाब (सगरी) बनाकर, उसमें जल भरते हैं। सगरी का जल, जीवन का प्रतीक है। तालाब के पार में बेर, पलाश, गूलर आदि पेड़ों की टहनियों तथा काशी केफूल को लगाकर सजाते हैं। सामने एक चौकी या पाटे पर गौरी-गणेश, कलश रखकर हलषष्ठी देवी की मूर्ति (भैस के घी में सिन्दुर से मूर्ति बनाकर) उनकी पूजा करते हैं। साड़ी आदि सुहाग की सामग्री भी चढ़ाते हैं तथा हलषष्ठी माता के छह कहानी को कथा के रूप में श्रवण करती हैं।

इस पूजन की सामग्री में पचहर चांउर(बिना हल जुते हुए जमीन से उगा हुआ धान का चावल), महुआ के पत्ते, धान कीलाई, भैस का दूध - दही व घी आदि रखतेहैं। बच्चों के खिलौनों जैसे-भौरा,बाटी आदि भी रखा जाता है। बल्कि ग्रामीण क्षेत्रों में गेडी (हरियाली त्योहार के दिन बच्चों केचढ़ने के लिए बनाया जाता है) को भी सगरी में रखकर पूजा करते हैं क्योंकि गेडी का स्वरूप पूर्णतः हल से मिलता जुलता है तथा बच्चों के ही उपयोग का है।

इस व्रत के बारे में पौराणिक कथा यह है कि वसुदेव-देवकी के 6 बेटों को एक-एक कर कंस ने कारागार में मारडाला। जब सातवें बच्चे के जन्म का समय नजदीक आया तो देवर्षि नारद जी ने देवकी को हलषष्ठी देवी के व्रत रखने की सलाह दी थी। देवकी ने इस व्रत को सबसे पहले किया जिसके प्रभाव से उनके आनेवाले संतान की रक्षा हुई।सातवें संतान का जन्म समय जानकर भगवान श्री कृष्ण ने योगमाया को आदेश दिया कि माता देवकी के इस गर्भस्थ शिशु को खींचकर वसुदेव की बड़ी रानी रोहिणी के गर्भ में पहुंचा देना, जो कि इस समय गोकुल में नंद-यशोदा के यहां रह रही है तथा तुम स्वयं माता यशोदा के गर्भ से जन्म लेना।योगमाया ने भगवान के आदेश का पालन किया जिससे देवकी के गर्भ से संकर्षण होकर रोहणी के गर्भ से संतान के रूप में बलराम का जन्म हुआ। उसके बाद देवकी की आठवीं संतान के रूप में साक्षात भगवान श्री कृष्ण प्रकट हुए। इस तरह हलषष्ठी देवी के व्रत-पूजन से देवकी के दोनों संतानों की रक्षा हुई।

हलषष्ठी का पर्व भगवान कृष्ण व भैया बलराम से संबंधित है। हल से कृषि कार्य किया जाता है तथा बलरामजी का प्रमुख हथियार भी है। बलदाऊ भैया कृषि कर्म को महत्व देते थे, वहीं भगवान कृष्ण गौ पालन को। इसलिए इस व्रत में हल से जुते हुए जगहों का कोई भी अन्न आदि व गौ माताके दुध, दही, घी आदि का उपयोग वर्जित है। साथ ही हलषष्ठी व जन्माष्टमी एक दिन के अंतराल में बड़े ही धूमधाम से मनाया जाता है।इस दिन उपवास रखनेवाली माताएं हल चलेवाले जगहों पर भी नहीं जाती हैं। इस व्रत में पूजन के बाद माताएं अपने संतान के पीठवाले भाग में कमर के पास पोता (नए कपड़ों का टुकड़ा - जिसे हल्दी पानी से भिगाया जाता है) मारकर अपने आंचल से पोछती हैं जो कि माता के द्वारा दिया गया रक्षा कवच का प्रतीक है।पूजन के बाद व्रत करनेवाली माताएं जब प्रसाद-भोजन के लिए बैठती हैं। तो उनके भोज्य पदार्थ में पचहर चावल का भात, छह प्रकार की भाजी की सब्जी (मुनगा, कद्दु ,सेमी, तोरई, करेला,मिर्च) भैस का दुध, दही व घी, सेन्धा नमक, महुआ पेड़ के पत्ते का दोना - पत्तल व लकड़ी को चम्मच के रूप में उपयोग किया जाता है। बच्चों को प्रसाद के रूप मे धान की लाई, भुना हुआ महुआ तथा चना, गेहूं, अरहर आदि छह प्रकार के अन्नों को मिलाकर बांटा जाता है।इस व्रत-पूजन में छह की संख्या का अधिक महत्व है। जैसे- भाद्रपद मास के कृष्ण पक्ष का छठवां दिन, छह प्रकार का भाजी, छह प्रकार का खिलौना, छह प्रकार का अन्नवाला प्रसाद तथा छह कहानी की कथा।
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शुक्रवार, 12 अगस्त 2016

छत्तीसगढ़ का इतिहास - संक्षिप्त एवं महत्वपूर्ण परिपेक्ष्य। [CGPSC Mains + Pre]

छत्तीसगढ़ का भारत के इतिहास में प्राचीन समय से लेकर आज तक महत्वपूर्ण स्थान रहा है, छत्तीसढ़ की सभ्यता और संस्कृति पूरे देश को सदैव आकर्षित करती रही है। धान का कटोरा की संज्ञा से अभिहित किये जाने वाले इस अंचल की चेतना विकासोन्मुखी रही है। ब्रिटीश साम्राज्य की स्थापना से पूरे भारत के साथ-साथ छत्तीसगढ़ में ब्रिटीश सत्ता के शोषण, अत्याचारों एवं भ्रष्टाचार पूर्ण शासन से छत्तीसगढ़ की जनता असंतुष्ट थी।

छत्तीसगढ़ के प्रथम शहीद गैद सिंह:- ब्रिटिश एवं मराठा शासन के अत्याचार से बस्तर के परलकोट क्षेत्र में अबूझमाड़ आदिवासियों के साथ लूटखसोट, शोषण एवं अत्याचार सैनिकों द्वारा किया जाने लगा । तब अबूझमाडि़यों आदिवासियों के द्वारा परलकोट के जमींदार गैदसिंह के नेतृत्व में 1818 में अंग्रेजी फौज को मार भगाने के लिए संघर्ष प्रांरभ हुआ । इस संघर्ष में हजारों आदिवासी शामिल हुए । बस्तर में मराठों और ब्रिटिश अधिकारियों की उपस्थिति से अबूझमाडि़यों को अपनी पहचान का खतरा उत्पन्न हो गया था । परलकोट के जमीदार गैदसिंह के नेतृत्व में अबूझमाडि़यों ने मराठों को रसद आपूर्ति में सहायक बंजारों को लूटा, मराठों और अंग्रेजों पर आक्रमण किये। 24 दिसम्बर 1824 को मराठों एवं अंग्रेज अधिकिारियों के शोषण नीति के विरूद्ध जमीदार गैदसिंह के नेतृत्व में विद्रोह हुआ। 20 जनवरी 1825 को परलकोट के जमींदार गैदसिंह को फांसी दे दी गई।

शहीद वीरनारायण सिंह:- 1857 में छत्तीसगढ़ में भीषण अकाल पड़ा, लोग भूख से मरने लगे, अंग्रेजी शासन की ओर से कोई व्यवस्था नही की गई थी। अपितु जमाखोर एवं साहूकारों ने अपने गोदामों में अनाज भरकर रख लिये थे। उस समय देश में ब्रिटिश शासन के खिलाफ विद्रोह प्रांरभ हो गया था। जनता की स्थिति को देखकर सोनाखान के जमीदार वीरनारायण सिंह ने साहूकारों की कोठरी से अनाज निकालवाकर भूखों के बीच बटवा दिया जिसके लिए उन्हें ब्रिटिश शासन ने गिरफ्तार कर रायपुर जेल में बंद कर दिया । वीरनारायण सिंह 1857 के विद्रोह में सम्मिलित होने के लिए जेल से भाग कर सोनाखान में फौजी टूकड़ी संगठित कर मुकाबले की तैयारी शुरू कर दी। वीर नारायण सिंह को संधि के बहाने गिरफ्तार कर उन पर राजद्रोह मुकदमा चलाकर रायपुर नगर के बीच चैराहे वर्तमान जयस्तंभ चौक के पास 10 दिसम्बर 1857 को फांसी दे दी गई।

रायपुर फौजी छावनी का विद्रोह:- शहीद वीरनारायण सिंह का त्याग और बलिदान व्यर्थ नही गया। 18 जनवरी 1857 संध्या 7:30 बजे मैग्जीन लश्कर हनुमान सिंह ने तीसरी टुकड़ी के सार्जेट मेजर रिसडवेल की हत्या कर विद्रोह प्रांरभ कर दिया। उनके सहयोगी सिपाही जो विद्रोह में सम्मिलित हुए उन्हें 22 फरवरी 1858 को सरे आम फांसी पर लटका दिया गया । यह फौजी छावनी का स्थान आज कल पुलिस ग्राउंड कहलाता है। शहीद हुए 17 सिपाहियों का नाम इस प्रकार हैः- गाजी खां, अब्दुलहयात, मुलीस, शिवनारायण, पन्नालाल, मातादीन, ठाकुरसिंह, बिल्हु, अकबर हुसैन, लल्लासिंह, बदलु, नजर मोहम्मद, शिवगोविन्द, देवी दीन ।

पराक्रमी सेनापति गुण्डाधुर:- सन् 1910 में बस्तर में ब्रिटीश शासन के विरूद्ध भूमकाल इतिहास की एक महत्वपूर्ण घटना है। बस्तर का विद्रोह लाल कालेन्द्र सिंह और रानी सुमरन कुंवर ने अंग्रेजों के अत्याचार एव अन्याय के विरोध प्रांरभ किया । इस आंदोलन का सेनापति गुण्डाधुर को चुना गया । इस विद्रोह मे सैकड़ो की संख्या में बस्तर के आदिवासी शहीद हुए । गिरफ्तार किये गये विद्रोही नेताओं में से अधिकांश रायपुर तथा चन्द्रपुर की जेल में बंदी बनाये गये। अधिकांश जेल में ही शहीद हो गये। छत्तीसगढ़ में 1910 का बस्तर का बस्तर में आदिवासी विद्रोह, रतनपुर में विद्रोह, 1911 में उरांव जाति का विद्रोह आदि ऐसे घटनाएं थी जो यहां के अरण्यांचल को प्रभावित कर रही थी।
भारतीय संस्कृति के मूलसंवाहक आदिवासी समुदाय ही रहे है। भारतीय स्वाधीनता संग्राम में अंग्रेजों के शोषण चक्र से निजात पाने हेतु बस्तर कांकेर के आदिवासियों, राज-परिवार के सदस्यों और जमीदारों ने विद्रोह का शंखनाद किया था । भारतीय स्वाधीनता संग्राम में बस्तर के आदिवासी विद्रोह की एक लम्बी परम्परा तथा निर्णायक भूमिका रही है। भारतीय स्वाधीनता संग्राम में बस्तर के आदिवासियों ने अपनी निर्णायक भूमिका अदाकर इस बात का प्रमाण प्रस्तुत किया कि मुख्यधारा से दूर रहकर भी वे राष्ट्र की नसों को भली-भांति जानते थे, परखते थे तथा राष्ट्र के प्रति उनकी भावनाएं अन्य व्यक्तियों के सामन ही थी ।
बस्तर में मराठों और अंग्रेजो अधिकारियों की लूट-खसोट और शोषण की नीति के खिलाफ सर्वप्रथम परलकोट के जमीदार गेंदसिंह ने 24 दिसम्बर 1824 ई. को विद्रोह किया था इस विद्रोह के माध्यम से अबूझमाडि़यों ऐसे संसार की रचना करना चाहते थें, जहां लूटखसोट और शोषण न हो। बस्तर में मराठों और ब्रिटिश अधिकारियों की उपस्थित से अबूझमाडि़यों को अपनी पहचान का खतरा उत्पन्न हो गया था। परलकोट के जमींदार गैंदसिंह के नेतृत्व में अबूझमाडि़यों ने मराठों को रसद आपूर्ति में सहायक बंजारों को लूटा, मराठों और अंग्रेजों पर आक्रमण किये।
परलकोट का विद्रोह बस्तर में विदेशी सत्ता को धूट चटाने के लिए हुआ था। यह विद्रोह बस्तर को गुलामी से मुक्त कराने का प्रथम प्रयास था। 10 जनवरी 1825 ई. को चांदा के पुलिस अधीक्षक कैप्टन पेव के नेतृत्व में मराठों और अंग्र्रेजों की सम्मिलित सेना ने परलकोट के विद्रोह का दमन किया । 20 जनवरी 1825 ई. को परलकोट के जमींदार गैदसिंह को फांसी दे दी गयी ।
बस्तर के दीवान जगबन्धु द्वारा तारापुर के परगने के लोगों पर नित्य नये कर लगाये जाते थें। इन करों से तारापुर परगने के आदिवासी काफी रुष्ट थे। 1842 ई. में तारापुर के आदिवासियों ने विद्रोह कर दिया । वे मांग कर रहे थे कि जब तक सारे कर वापस नहीं लिये जाते और उसे अपने नेता दलंगजन सिंह के हाथों सौंप दिया । नागपुर के रेजीडेन्ट मेजर विलियम्सन ने जगबन्धु को पद से हटा दिया और आदिवासियों पर लगने वाले करों को वापस ले लिया था । बस्तर के इतिहास में यह विद्रोह तारापुर का विद्रोह ( 1842-1854) के नाम से प्रसिद्ध है।
1842 ई. में दंतेवाड़ा की आदिम जनजातियों ने आंग्ल मराठा शासन के खिलाफ आत्मरक्षा के निमित अपनी परम्परा और रीति रिवाजों पर होने वाले आक्रमण के विरूद्ध विद्रोह किया था। यह विद्रोह मेरिया विद्रोह (1842 से 1863ई.) के नाम से प्रसिद्ध है। ब्रिटिशों ने बस्तर में दंतेवाड़ा मंदिर में प्रचलित नरबोले के संस्कार मेरिया या नरबलि को समाप्त करने के लिए बस्तर के राजा भूपालदेव को आदेश दिया था नर बलि को रोकने के लिए नागपुर के भोंसला राजा ने एक सुरक्षा टुकड़ी दंतेवाड़ा के मंदिर में नियुक्ति की थी। दंतेवाड़ा के आदिवासियों ने इसे अपनी परम्पराओं पर बाहरी आक्रमण समझा और विद्रोह कर दिया । हिड़मा माडि़या के नेतृत्व में विद्रोहियों ने सैनिक पर आक्रमण किया । अन्त में रायपुर से आयी हुई सेना ने विद्रोहियों का दमन किया ।
ब्रिटिश सरकार से राजा भैरमदेव दीवान दलगंजन सिंह और आदिवासी जनता काफी असंतुष्ट थी। लिंगागिरी के तालुकेदार धु्रर्वाराव के नेतृत्व में विद्रोहियों ने 1856 ई. में अंग्रेजों के खिलाफ विद्रोह किया। बस्तर के इतिहास में इस 1856 ई. के महान मुक्ति संग्राम कहा जाता है। विद्रोहियों ने गांवों को लूटा और माल के लदी बैलगाडि़यों पर कब्जा किया। 3 मार्च 1856 ई. को चिन्तलनार में अग्रेजों और विद्रोहियों के मध्य संघर्श हुआ। अंग्रेजों ने 460 माडि़या औरतों व बच्चों को बंदी बनाया और धुर्वाराव को पकड़कर फांसी दी । लिंगागिरी परगने को भोपालपटनम जमीदारी में मिला दिया गया ।
1859 ई. में दक्षिण बस्तर में स्थिति भेजी, फोतफेल और कोतापल्ली के कोई जमींदारों ने शालवृक्षों के काटे जाने के खिलाफ विद्रोह किया था। कोईयों द्वारा किये गये विद्रोह को कोई विद्रोह कहा जाता है। इस विद्रोह का मूल कारण ब्रिटिश सरकार द्वारा यहां के जंगलों को हैदराबाद के व्यापारियों को ठेके पर दिया गया था। अन्त में सभी मांझी प्रमुखों ने निर्णया किया कि वे बस्तर में साल सागौन का एक भी वृक्ष काटने नहीं देगें । विद्रोहियों ने एक साल या सागौन वृक्ष के पीछे एक व्यक्ति का सिर का नारा दिया। इस विद्रोह की भयानकता को देखकर ग्लासफर्ड ने अपनी हार मान ली और उसने बस्तर में लकड़ी ठेकेदारी की प्रथा समाप्त कर दी ।
1876 ई. में अंग्रेजों के आर्थिक शोषण के खिलाफ बस्तर के आदिवासियों ने विद्रोह किया था । बस्तर के इतिहास में इस विद्रोह को 1876 ई. का मुरिया विद्रोह कहा जाता है। इस विद्रोह का प्रमुख कारण अंग्रेजी शासन द्वारा कृषि का व्यापारीकरण करना था। जिसमें रयैतवाडी प्रथा, लगान, अदा न करने पर भूमि अधिग्रहण। स्टाफ एक्ट, जंगल की लकड़ी पर कर, शराब भट्टियों पर उत्पाद शुल्क लगा दिया गया । जिसकी ग्राम प्रमुख बेरहमी से वसूली करते थे जिससे विद्रोह की शुरूआत हुई। 2 मार्च 1876 को विद्रोहियों ने महल को घेर लिया अन्त में मैकजार्ज की मर्यादा तथा संयम के कारण विद्रोह को दबाया जा सका। नैतिक कारणों से आदिवासी जीता हुआ युद्ध हार गये। किन्तु इस मुरिया विद्रोह ने 1910 ईं. के महान विद्रोह को प्रेरणा प्रदान की थी।
1910 ई. में बस्तर के आदिवासियों ने अंग्रेजों के खिलाफ सशस्त्र विद्रोह किया था। इन विद्रोह का प्रमुख लक्ष्य बस्तर में मुरिया राज की स्थापना और ब्रिटिश राज को नेस्तनाबूद करना था।
बस्तर के आदिवासियों ने अंग्रेजों के अत्याचारों से रुष्ट होकर लाल कालेन्द्र सिंह के नेतृत्व में अक्टूबर 1909 ई. में अंग्रेजों के खिलाफ जंग का एलान किया। विद्रोहियों ने काफी गोपनीय ढंग से तैयारी की थी । विद्रोहियों की इस गुप्त तैयारी से पोलिटिकल एजेन्ट डिबे्रट भी बेखबर था। 1 फरवरी 1910 ई. को विद्रोह प्रांरभ हुआ, विद्रोहियों ने लूटमार तथा आगजनी थी। आगामी तीन महिनों तक बस्तर के आदिवासी अंग्रेजी से लड़ते रहे। 7 फरवरी 1910 ई. में विद्रोहियों ने गीदम में गुप्त सभा आयोजित कर मुरियाराज की घोषणा की थी। विद्रोहियों ने बारसूर, कोण्टा, कुटरू, कुंआकोण्डा मद्देड़, भोपालपटनम, जागरगुण्डा, उसूर, छोटे डोंगरे, कुतुल और बहीगांव पर आक्रमण किये । 16 फरवरी 1910 ई. को अंग्रेजों और विद्रोहियों के मध्य खड़गघाट पर भीषण संघर्ष हुआ था। 24 फरवरी गंगामुंडा में विद्रोहियों की पराजय हुई। 25 फरवरी 1910 ई. को अलनार में विद्रोहियों ने गुंडाधूर के नेतृत्व में अंग्रेजो के साथ संघर्ष किया । 25 मार्च 1910 ई. को विद्रोहियों ने नेतानार में गेयर पर हमला किया। अंग्रेजो ने 6 मार्च 1910 ई. से विद्रोहियों का बुरी तरह से दमन करना शुरू किया, लाल कालेन्द्र सिंह, और राजमाता सुवर्ण कुमारी देवी को अंग्रेजो ने गिरफ्तार किया । इस विद्रोह के बाद अंग्रेजों ने आदिवासी संस्थाओं को सम्मान देते हुए आदिवासियों से जुड़ने का प्रयास किया ।

बस्तर -कांकेर में जनजागरण:-
भारतवर्ष में जिन कारणों के फलस्वरूप राष्ट्रीय चेतना का विकास हुआ, उनसे बस्तर-कांकेर भी प्रभावित हुये बिना न रह सका। यहां भी असंतोष के स्वर मुखरित हुये, जिससे बस्तर-कांकेर में राष्ट्रीय चेतना का आविर्भाव हुआ। इस प्रकार यह क्षेत्र भी देश की मुख्यधारा से जुड़ा रहा ।
कांग्रेस ने बंबई के अधिवेशन में ऐतिहासिक प्रस्ताव अंग्रेजो भारत छोड़ो पारित किया भारत छोड़ों आंदोलन से बस्तर भी प्रभावित हुये बिना न रह सका । जगदलपुर में श्री पी.सी. नायडू के नेतृत्व में आन्दोलन चलाया गया । जगदलपुर में नायडू द्वारा सोडा फैक्ट्री चलायी जाती थी। श्री पी.सी. नायडू के नेतृत्व में मोहसिन और उसके साथियों ने एक रात्रि में जगदलपुर स्कूल में स्थित यूनियन जैक को फ्लेग पोस्ट सहित जलाकर राख कर दिया। श्री नायडू ने कांकेर सहित अनेक स्थानों का दौरा कर कांग्रेस स्थापना में अपनी महत्वपूर्ण योगदान किया था।
ठाकुर प्यारे लाल सिंह के प्रयासों के कारण 1945 ई. में कांकेर में कांग्रेस पार्टी की स्थापना हो सकी। आदिवासी नेता रामप्रसाद पोटाई को कांग्रेस पार्टी का अध्यक्ष पं. गोविन्द प्रसाद शर्मा को महामंत्री और अजित कुमार भट्टाचार्य को उपाध्यक्ष बनाया गया था। कांकेर, भानुप्रतापपुर और चारामा के लिए कांग्रेस पार्टी की अलग से मंडल समितियां गठित की गई थी।
कांकेर रिसायत में सविनय अवज्ञा आंदोलन प्रारंभ करने का श्रेय सुरंगदाह ( दुर्ग कोदल) निवासी इंदरू केवट नामक व्यक्ति को है। वे महात्मागांधी के सच्चे भक्त और अनुयायी थें। इन्दरू केवट महात्मा गांधी की तरह साधारण धोतीधारण कर हाथ में झंडा लेकर गांव-गांव में गांधी जी और कांग्रेस की जय-जयकर करते हुए पैदल घुमते थे और गांधी जी के सिन्द्धातों का प्रचार करते थे। इन्दरू केवट के कारण कांकेर रियासत की जनता राष्ट्रीय नेताओं के नामों, कांग्रेस के सिद्धांतों व कार्यक्रमों तथा तिरंगे झंडे से परिचित हो सकी।
1942 ई. के भारत छोड़ो आंदोलन में विश्णु प्रसाद शर्मा ने सक्रिय भूमिका अदा की। अक्टूबर 1942 ई. में वे क्रांतिकारी नेता सुधीर मुखर्जी से जुडें । 1942 ई. में शर्मा स्टूडेण्ट ऑफ इंडिया शाखा रायपुर के सदस्य बनें। 1943 ई. में वे कांग्रेस के सदस्य बने। 1945 ई. में शर्मा जी ने रायपुर के छात्रों का नेतृत्व किया । वे रायपुर के छात्रों को दिल्ली ले गये, दिल्ली में उन्होंने वायसराव लार्ड बावेल के खिलाफ तीन दिनों तक प्रदर्शन किया था।

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छत्तीसगढ़ी साहित्य एवं साहित्यकार संक्षिप्त सूची।

छत्तीसगढी का पाणिनी किसे कहा जाता है – हीरालाल काव्योपाध्याय

बियासी के नागर (गीत) – कुंजबिहारी चौबे

छत्तीसगढ़ी कृति खुब तमाशा के लेखक कौन है – गोपाल मिश्र

सुवा हमर संगवारी – लखनलाल गुप्त

छत्तीसगढ़ी व्याकरण का प्रकाशन काल – 1890 ईसवी

मेघदुत का छत्तीसगढ़ी अनुवाद किसने किया – मुकुटधर पांडेय

पर्रा भर लाई काव्यसंग्रह के सृजनकर्ता - पं श्यामलाल चतुर्वेदी

आवा (उपन्यास) के लेखक – परदेशी राम वर्मा

सुवा हमर संगवारी (लेख) – लखनलाल गुप्त

परेमा (एकांकी) – नन्दकिशोर तिवारी

आंसु म फिले अचरा (कहानी) – केयुर भुषण

दुनिया अठवारी बाजार रे...(कविता) – नरेंद्रदेव वर्मा

करम छड़हा(नाटक) – खुबचंद बघेल

रमिया और केतकी(कहानी) – सत्यभामा आडिल 

प्राचीन छत्तीसगढ़ के लेखक – प्यारे लाल गुप्त

छत्तीसगढ़-परिचय के लेखक – बलदेव प्रसाद मिश्र

छत्तीसगढ़ी बोली, व्याकरण और कोष के लेखक – डा० कांति कुमार

छत्तीसगढ़ी भाषा की किसी एक पत्रिका का नाम – छत्तीसगढ़ मित्र

मोंगरा उपन्यास के लेखक – शिव शंकर शुक्ल

छत्तीसगढ़ी के तीन महकाव्यों के प्रणेता – प्रणयन जी

छत्तीसगढ़ी दानलीला के लेखक – प० सुंदरलाल शर्मा

छ०ग० में सतनाम धर्म के प्रवर्तक – गुरु घासीदास

छत्तीसगढ़ लोकसाहित्य का अध्ययन के लेखक – दया शंकर शुक्ल

छत्तीसगढ़ी का भाषाशास्त्रिय अध्ययन के लेखक – शंकर शेष

छ्त्तीसगढ़ी साहित्य अउ साहित्यकार के लेखक -  विनय कुमार पाठक

फुटहा करम उपन्यास के लेखक - हृदय सिंह चौहान

छत्तीसगढ़ी सुराज के लेखक -   गिरिवर दास वैष्णव

भरथरी की लोकप्रिय गायिका – सुरुज बाई खांडे

जन्मांध भक्त कवि – नरसिंह दास वैष्णव

दानलीला काव्य का मुल श्रोत – श्री कृष्ण भक्ति

छत्तीसगढ़ी में रासलीला की परम्परा का नाम – रहस

हिन्दी के कुछ महत्वपूर्ण शब्दों के पर्यायवाची शब्द। [Hindi Vyakaran]

पर्यायवाची शब्द :-

शब्द - अश्व
पर्यायवाची - घोड़ा, तुरंग, हय, वाजि, घोटक, सैंधव

शब्द - अनुपम
पर्यायवाची - अद्वितीय, अनोखा, अपूर्व,अद्भुत, निराला, अनूठा

शब्द - अग्नि
पर्यायवाची - आग, अनल, पावक, ज्वाला, वह्नि

शब्द - अर्जुन
पर्यायवाची - भारत, गुडाकेश, पार्थ, सहस्त्रार्जुन

शब्द - अचानक
पर्यायवाची - अकस्मात, अनायास, एकाएक, दैवयोग

शब्द - अमृत
पर्यायवाची - सुधा, पीयूष, अमिय, सोम, अमी

शब्द - अहंकार
पर्यायवाची - दंभ, घमंड, दर्प, अभिमान

शब्द - अंधकार
पर्यायवाची - तिमिर, अँधेरा, तम, तमिस्त्र

शब्द - आँख
पर्यायवाची - नेत्र, लोचन, दृग, चक्षु, नयन, विलोचन

शब्द - आकाश
पर्यायवाची - गगन, आसमान, अंबर, नभ, अनंत, शून्य, व्योम

शब्द - आभूषण
पर्यायवाची - अलंकार, भूषण, गहना, जेवर

शब्द - इंद्र
पर्यायवाची - सुरेश,  देवेंद्र,  देवराज,  पुरंदर, सुरपति, महेंद्र, देवेश

शब्द - ईश्वर
पर्यायवाची - प्रभु,  परमेश्वर,  भगवान,  परमात्मा, दीनबंधु, जगन्नाथ

शब्द - इच्छा
पर्यायवाची - आकांक्षा,  चाह,  अभिलाषा,  कामना

शब्द - उन्नति
पर्यायवाची - उत्थान, विकास, प्रगति, अभ्युदय, उत्कर्ष

शब्द - उद्यान
पर्यायवाची - बाग, बगीचा, फुलवारी, उपवन, वाटिका

शब्द - कपड़ा
पर्यायवाची - वस्त्र, पट, अंबर, वसन, चीर

शब्द - कमल
पर्यायवाची - जलज, अंबुज, नीरज, पंकज, वारिज, अरविंद, सरसिज, नलिन, राजीव, सरोज

शब्द - कामदेव
पर्यायवाची - मदन, मनसिज, मनोज, विश्वकेतु, काम, पंचशर, रतिपति, अनंग

शब्द - किरण
पर्यायवाची - अंशु, कर, रश्मि, मरीचि, मयूख

शब्द - किनारा
पर्यायवाची - तट, तीर, कगार, कूल

शब्द - कोयल
पर्यायवाची - पिक, कोकिला, श्यामा, वसंतदूत

शब्द - कृष्ण
पर्यायवाची - श्याम, घनश्याम, कान्हा, केशव, माधव, वासुदेव, गोपाल, राधा-वल्लभ, मोहन, गिरिधर, मुरारि

शब्द - कुबेर
पर्यायवाची - किन्नरेश, यक्षराज, घनंद, धनपति

शब्द - गणेश
पर्यायवाची - गणपति, गजानन, गजवदन, विनायक, भवानीनंदन।

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